इन दिनों भाषा को लेकर इतने झमेले हो गए हैं कि भाषा के माध्यम से अपने मन की भावना, बात ,विचार दूसरे  तक पहुँचाना शायद हम भूल गए हैं। भाषा के द्वारा दूसरे के मन की बात , भावना समझना तो और ही भूल गए हैं। कहा जाता हैं कि बिना कुछ कहे भी सामने वाले के मन की बात उतनी ही गहराई से जान ली जाती हैं जितनी गहराई से वह सोच रहा होता है। यह सब कैसे होता होगा ? इन दिनों हम इतने जोर – जोर से और इतना अधिक बोलते रहते हैं कि हमें कोई सुनता भी है , इसके बारे में सोचने के लिए भी हमारे पास वक्त नहीं बचता। बस में ,रेल में , रास्ते -चौराहे पर , कैंटीन , कॉलेज ,स्कूल , बस स्टॉप ,होटल – जगह चाहे कोई भी हो जोर – जोर से ,ऊँची आवाज में बात करना हमारी आदत ,फ़ैशन ,आवश्यकता (?) ,शायद स्वभाव बन गया है।

भले ही दो व्यक्ति आपस में बातें कर रहे हो लेकिन आवाजें इतनी ऊँची कि दूर – दूर तक लोग सुन सके और
उकता सके। फिर भी संवाद क्यों नहीं हो पाता ? एक – दूसरे के मन का पता एक दूसरे को क्यों नहीं चलता ? हमें कोई समझ सका है इस अनुभूति से सुरक्षित क्यों नहीं लगता ? इतने दोस्त , लोग , भीड़ ,पार्टियाँ , मौज – जा आदि के बीच भी भटकन क्यों ? किसी के हजारों शब्दों को सुनने के बाद भी अविश्वास क्यों ?

शब्द वही फिर भी भावनाएँ ,अर्थ खो क्यों गए हैं ?

भावनाएँ , अर्थ , विश्वास , अनुभूति , सह-अनुभूति , साथ होने का भाव शब्दों ने खोया है या हमने ?
हम भटक गए हैं या शब्द ?

संवाद हम भूल चुके हैं या शब्द ?