अमृता प्रीतम की रचना पर आधारित  ‘ पिंजर ‘ फिल्म में एक गाना है – ‘ हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते ‘ यह सुनते समय  कई साल पहले देखी फिल्म  ‘ थोड़ी सी बेवफाई ‘ का गाना ‘ आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं ‘ अचानक याद आया।
दोनों गाने बिल्कुल विरोधी या एक – दूसरे को काटने वाली बात कह रहे थे फिर  भी एक गाना सुनते समय दूसरा गाना क्यों याद आया ?

जो बात , रिश्ता , अनुभूति , अनुभव , देखा – सुना हुआ ,सोचा हुआ बिल्कुल मन से , ह्रदय से ,गहराही से , अतल अनुभूति से अनुभूत – महसूस किया जाता है वह पारदर्शी , तरल , आकाश की तरह अदृश्य फिर भी सच – दृश्य होता है। हमेशा अपनी ही तरह से अपने साथ रहता है। छूटने – बिछडने पर भी छूटते – बिछडते नहीं हैं। अपने विचारों में बहते -चलते रहते हैं।
ऐसे में भाषा – शब्द – अभिव्यक्ति – कोई भी स्थूल – बाह्य की जरुरत नहीं रहती।

ऐसा जब -जब होता है तो जीवन अधिक अपना , सुंदर लगता है और सुरक्षित भी। और जब बिल्कुल स्थूल – बाह्य रूप में सोचने – समझने – जीने लगते हैं तो कुछ  न कुछ बिछडने का – असुरक्षित होने का डर सताने लगता है।

दोनों फिल्मों में के ये दोनों गाने जीवन की सच्चाइयाँ हैं – उत्तर और दक्षिण ध्रुव की तरह। और दो विरोधी ध्रुवों  में हमेशा आकर्षण रहता है।

‘ हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छूटा करते ‘ —– ‘ आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं ‘ – जीवन अनुभव के दो पहलू : ऊपर से एक – दूसरे के विरोध में दिखने वाले लेकिन दोनों मिलकर जीवन की एक सच्चाई दिखाने वाले ….और हम भी पृथ्वी के दो ध्रुवों के बीच की सच्चाई हैं – इन गानों की तरह।